जलवायु परिवर्तन: बढ़ती गर्मी में कूलिंग ऐशोआराम नहीं बल्कि एक ज़रूरत

10 Jul 2020

आने वाले वक़्त में तापमान बढ़ेगा। बढ़ती हुई गर्मी के साथ देश में कूलिंग की ज़रूरत कई गुना बढ़ जाएगी। कूलिंग की आवश्यकताओं को नियंत्रित करने के लिए हमें एनर्जी कंज़र्वेशन बिल्डिंग कोड्स और ग्रीन बिल्डिंग रेटिंग को बड़े पैमाने पर अपनाने की ज़रूरत है। "कूलिंग इंडिया" को एक अभियान की तरह आगे बढ़ाना होगा।

Climate change

अभी हाल में ही भारत सरकार के पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय ने "भारतीय क्षेत्र पर जलवायु परिवर्तन का आकलन” शीर्षक से एक रिपोर्ट प्रकाशित की। इस अध्ययन के हिसाब से देश में पिछले कई सालों में गर्म दिनों और रातों की औसत आवृत्ति में वृद्धि हुई है। दीर्घकालीन पूर्वानुमान के अनुसार इस सदी के अंत तक भारत के अधिकांश हिस्सों में औसत वार्षिक वार्मिंग 4°C से अधिक होगी। अंततः प्री-मॉनसून सीज़न हीटवेव की आवृत्ति, अवधि, और तीव्रता का इक्कीसवीं सदी के दौरान काफी हद तक बढ़ने का अनुमान है। शोध यह पहले ही स्थापित कर चुके हैं कि बढ़ती हुई गर्मी हमारे स्वास्थ्य के लिए कितनी प्रतिकूल साबित हो सकती है। वातावरण के उच्च तापमान हीट स्ट्रोक, हृदय और तंत्रिका संबंधी रोगों और तनाव से संबंधित विकारों का खतरा और भी बढ़ा देतें हैं।

अगर हम इस परिप्रेक्ष्य की गहराई से विवेचना करें तो हमें यह स्पष्ट हो जाता है कि आने वाले वर्षों में हमारे देश में कूलिंग की ज़रुरत कई गुना बढ़ जाएगी। कूलिंग की इस बढ़ती हुई आवश्यकता का सम्बन्ध सिर्फ़ हमारी बेहतर होती जीवन शैली से ही नहीं है बल्कि उन बुनयादी कारणों से है जो सीधे जुड़ते हैं लोगों के स्वास्थ्य एवं उनकी प्रोडक्टिविटी से। दूसरे शब्दों में, जलवायु परिवर्तन की वजह से जैसे जैसे तापमान और हीट वेव्स बढ़ रहीं हैं, कूलिंग हमारी बड़ी ज़रूरत बनती जा रही है। अब हम इसे समृद्धि और ऐशोआराम के नज़रिए से नहीं देख सकते जैसा कि विकसित देशों के कुछ लोगों की धारणा है। कूलिंग हमारी एक सामाजिक और आर्थिक ज़रूरत है। दरअसल कूलिंग और सस्टेनेबल डेवलपमेंट गोल्स - जैसे कि गुड हेल्थ और वेलबीइंग (एसडीजी 3), डिसेंट वर्क एंड इकोनॉमिक ग्रोथ (एसडीजी 8), और सस्टेनेबल सिटीज एंड कम्युनिटीज (एसडीजी 11) - आपस में बहुत गहराई से जुड़े हैं।

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"इक्कीसवीं सदी के दौरान बढ़ेगी प्री-मॉनसून सीज़न हीटवेव की आवृत्ति, अवधि, और तीव्रता। बढ़ती हुई गर्मी हमारे स्वास्थ्य के लिए प्रतिकूल साबित हो सकती है। आने वाले वर्षों में हमारे देश में कूलिंग की ज़रुरत बढ़ जाएगी। कूलिंग लोगों के स्वास्थ्य और प्रोडक्टिविटी के लिए ज़रूरी हो जाएगी। "

इन वास्तविकताओं को ध्यान में रखते हुए, भारत ने एक विस्तृत कूलिंग एक्शन प्लान विकसित किया है जिसमें ना केवल देश की अर्थव्यवस्था के अलग अलग क्षेत्रों में कूलिंग की जरूरतों की समीक्षा है बल्कि कूलिंग की मांगों को कम करने के तरीकों को भी सूचीबद्ध किया गया है। बढ़ती हुई कूलिंग के लिए अधिक ऊर्जा की भी आवश्यकता होगी, यह प्लान आर्थिक और पर्यावरणीय नज़रियों में तालमेल बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

कूलिंग के लिए आज अधिक प्रमुखता एयर कंडीशनिंग को दी जा रही है, समय आ गया है जब हम एयर कंडीशनर्स से परे भी सोचें। यदि सरकार सुपर एफिशिएंट एयर कंडीशनर्स लाने में प्रयत्नशील है तो कोई कारण नहीं है कि सुपर एफिशिएंट कूलर्स के शोध और विकास को भी प्राथमिकता ना मिले। जहाँ एक ओर आधुनिकता की इस दौड़ में पंखे और डेजर्ट कूलर्स अपना महत्व तेजी से खोते जा रहें है, दूसरी ओर बड़ी विडम्बना यह है कि हम अपनी परंपारिक दक्षता, अपनी प्राचीन वास्तुकला को भूलते जा रहें हैं। हमारे शहरों की और हमारी इमारतों की ये पद्धतियां ना केवल अंदरूनी तापमान अपितु बाहरी, वातावरण के, तापमान को ठंडा रखने में मदद कर सकती हैं; यह सब हम भूल चुके हैं।

चूँकि भारत के बिल्डिंग स्टॉक का एक महत्वपूर्ण हिस्सा अभी तक निर्मित नहीं किया गया है, इसलिए एनर्जी एफिशिएंट डिज़ाइन के माध्यम से भविष्य की कूलिंग की आवश्यकताओं को नियंत्रित करने का अवसर हमारे पास है। हालांकि हमारे एनर्जी कंज़र्वेशन बिल्डिंग कोड्स में पैसिव बिल्डिंग डिज़ाइन एक अहम स्थान रखता है; वो सभी इमारतें जो अब बनाई जा रही हैं, उनमे इन कोड्स को बड़े पैमाने पर अपनाने की ज़रूरत है। परन्तु वस्तुस्थिति यह है कि आज के अपार्टमेंट्स और दूसरी इकाइयों में प्राकृतिक वेंटिलेशन जैसे प्रावधान तो एक अपवाद बन कर रह गए हैं। पहले हमारा आधुनिक आर्किटेक्चर हमारे इर्द गिर्द के तापमान को बढ़ाने में योगदान देता है जिसको फिर हम एयर कंडीशनिंग द्वारा ठंडा करने का प्रयास करते हैं। पूर्वकालीन स्थापत्य स्थानीय मौसम और स्तिथियों पर आधारित होता था। चाहे गुडगाँव और हैदराबाद की जलवायु में ज़मीन आसमान का फर्क हो लेकिन आज के कंक्रीट-ग्लॉस के भवनों की डिज़ाइन दोनों जगह एक जैसी मिलेगी।

अतः यह स्पष्ट है कि चाहे वो एनर्जी कंज़र्वेशन बिल्डिंग कोड्स हों या फिर हमारी अपने मौसम और पद्धितियों के अनुसार विकसित ग्रीन रेटिंग प्रणाली 'GRIHA'; अब हमें इनके स्वैच्छिक अभिग्रहण की बजाय इनका इस्तेमाल अनिवार्य करना होगा। इसके अलावा हमें अफोर्डेबल भवनों पर तुरंत ध्यान देने की आवश्यकता है। अफोर्डेबल भवनों की डिज़ाइन ऐसी हो कि वे प्राकृतिक तरीकों से निवासिओं को ठंडक प्रदान कर सकें एवं जिनके अंदर कूलिंग उपकरणों की आवश्यकता कम से कम पड़े।

Royal orange county

" भारत के बिल्डिंग स्टॉक का एक महत्वपूर्ण हिस्सा अभी तक निर्मित नहीं किया गया है, इसलिए एनर्जी एफिशिएंट डिज़ाइन के माध्यम से भविष्य की कूलिंग की आवश्यकताओं को नियंत्रित करने का अवसर हमारे पास है। वो सभी इमारतें जो अब बनाई जा रही हैं उनमें एनर्जी कंज़र्वेशन बिल्डिंग कोड्स और ग्रीन बिल्डिंग रेटिंग को बड़े पैमाने पर अपनाने की ज़रूरत है। "

रोचक बात यह है कि जहाँ हमारी रीयल एस्टेट परियोजनाओं में सिंगापुर आदि देशों के विख्यात आर्किटेक्ट्स को लाने की होड़ लगी रहती है, उन्हीं देशों में अर्बन क्षेत्रों को ठंडा रखने के लिए क्या क्या उपाय किये जा रहें हैं वो हमारे लिए कोई खास मायने नहीं रखते क्योंकि हमारा ध्यान बाहरी सौंदर्य की तरफ अधिक है। अतः अत्यंत आवश्यक है कि हम ना केवल अपने प्रासंगिक स्थापत्य से प्रेरणा लें बल्कि दुनिया के विभिन्न देशों में कूलिंग के लिए हो रहे प्रयासों से भी सीखें।

सिंगापुर में सरकार शहरी पर्यावरण मॉडलिंग का प्रयोग कर रही है, बिल्डिंग्स के इस प्रकार के ओरिएंटशन करने के लिए जिससे हवा के प्रवाह और छाया को अधिकतम किया जा सके। उसी प्रकार 'कूलिंग सिंगापुर' परियोजना के तहत वर्टिकल हरियाली को इमारत की बाहरी सतहों पर वनस्पति तत्वों के बढ़ने के रूप में परिभाषित किया गया है। इसी प्रकार न्यूयॉर्क शहर - और अहमदाबाद - ने अपने शहरी तापमान को कम करने के लिए "कूल रूफ" कार्यक्रम शुरू किया है। अर्बन हीट आइलैंड एक और महत्वपूर्ण आयाम है जिसके बारे में कई देश अध्ययन कर रहे हैं कि कैसे शहरों के तापमान को कम रखने के लिए इसको नियंत्रित करा जा सके। इस दिशा में साल 2007 और 2015 के बीच न्यूयॉर्क शहर में 10 लाख पेड़ लगाए गए। मेलबर्न शहर गर्मी से लड़ने की दीर्घकालीन योजना के अंतर्गत साल 2040 तक अपने ग्रीन कवर को 22 प्रतिशत से बढ़ा कर 40 प्रतिशत करने के उद्द्येश से कार्यरत है। इसके बिलकुल विपरीत हमारा एक-आयामी शहरी विकास बचीखुची हरियाली भी समाप्त करने की दिशा में तेजी से अग्रसर है।

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"एनर्जी कंज़र्वेशन बिल्डिंग कोड्स हों या फिर हमारी अपने मौसम और पद्धितियों के अनुसार विकसित ग्रीन रेटिंग प्रणाली 'GRIHA'; इनका व्यापक इस्तेमाल अनिवार्य करना होगा। "

अब मौसमवैज्ञानिकों ने चेतावनी दे दी है। इस अग्रिम चेतावनी को ध्यान में रखते हुए हमें बिना देरी किए इस दिशा में काम करने की ज़रूरत है। बढ़ता हुआ तापमान देश की काफी बड़ी जनसँख्या के लिए अस्तित्व को बनाए रखने का संकट पैदा कर सकता है। इस स्तिथि से निपटने के लिए कई स्तरों पर एक साथ आगे बढ़ना होगा। उदाहरण के तौर पर:

  • भवन निर्माण से सम्बंधित सभी हिस्सेदारों में स्थानीय मौसम के अनुकूल डिज़ाइन की जागरूकता व्यापक स्तर पर बढ़ाने का लक्ष्य होना चाहिए।
  • सरकारों का, विशेषकर स्थानीय निकायों और शहरी विकास एजेंसियों का अर्बन प्लानिंग में वैज्ञानिक नियमों और सुस्थापित प्रक्रियाओं का समावेश करना।
  • हमारे शहरों को अब स्मार्ट से और अधिक स्मार्ट बनाने की आवश्यकता है ताकि नागरिकों को एक आरामदायक और स्वस्थ वातावरण मिल सके।

ये सभी कदम कूलिंग की ज़रूरतों को एक सीमा तक नियंत्रित ही कर पायंगे, अतः इनके अतिरिक्त हमको और अधिक एफिशिएंट कूलिंग उपकरणों के विकास और उत्पादन पर भी जोर देना होगा जो कि आम नागरिक की आर्थिक पहुँच के अंदर हों।

यह पूर्वानुमान कि देश की लगभग 60 प्रतिशत जनसंख्या साल 2050 तक शहरों में बसेगी इंगित करता है कि अब समय है 'कूलिंग इंडिया' अभियान की शुरुआत का; एक ऐसा अभियान जो हमारी अर्थव्यवस्था के विकास का एक अभिन्न घटक हो।

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