जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए भारत कितना है तैयार?

15 Apr 2020

Water air change

वैश्विक आबादी के लगभग 30% कमजोर वर्ग के लोग भारत में रहते हैं। परन्तु हमारे ग्रामीण क्षेत्रों में वास्तविकता और भी ख़राब है जहाँ 48% घर बुनियादी सामाजिक-आर्थिक सेवाओं से भी वंचित हैं। यह स्थिति और भी चिंताजनक हो जाती है जब बदलते मौसम की वजह से साल-दर-साल गंभीर वित्तीय तनाव का सामना कर रहे किसानों को भी इसमें शामिल कर लिया जाए। जलवायु परिवर्तन के गंभीर परिणाम हमारे सामने हैं- मौसम में बढ़ते हुए बदलाव, अनियमित वर्षा, एवं बाढ़ और सूखे जैसी घटनाओं का बार बार होना आदि। इसलिए यह स्पष्ट है कि अगर अभी भी हम इन घटनाओं की अनदेखी करते हैं तो निकट भविष्य में हम इनका सामना करने के लिए तैयार नहीं होंगे। और सबसे दुखद तथ्य यह है कि इन त्रासदियों से प्रभावित होने वाले लोग वही हैं जो पहले ही हर दृष्टि से सबसे असुरक्षित, सुविधाहीन, और हाशिए पर हैं।

जलवायु परिवर्तन की दृष्टि से भारत की कुछ जगहों पर विश्व बैंक का कहना है "भारत के मध्य, उत्तरी और उत्तर-पश्चिमी भागों में स्थित राज्य औसत तापमान और वर्षा में परिवर्तन की दृष्टि से सबसे अधिक संवेदनशील हैं। छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश दो ऐसे राज्य हैं जहाँ जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न विपरीत परिस्थितयों के कारण जीवन स्तर में 9% से अधिक गिरावट का अनुमान है; इसके बाद आते हैं राजस्थान, उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र। गरीबी अधिक होने के अलावा, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश ऐसे राज्य हैं जहाँ आदिवासी जनसँख्या भी अधिक है। इस पृष्ठभूमि में जलवायु परिवर्तन के प्रभाव आर्थिक और सामजिक न्याय के दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण हैं।"

वैज्ञानिक पूर्वानुमान है कि जलवायु परिवर्तन के नकारात्मक परिणाम बड़े पैमाने पर होंगे। जैसे कि तापमान में वृद्धि और आमतौर में होने वाले मानसून में काफी बदलाव। मौसम के इस बदलाव का सीधा असर खेती की उपज और फसलों के प्रकार एवं बुआई पर होगा; अंततः उन सभी क्षेत्रों पर जिनसे किसानों की आजीविका मूलभूत रूप से जुडी है। जलवायु परिवर्तन से छोटे और सीमांत किसानों के सबसे अधिक प्रभावित होने की संभावना है क्योंकि ना केवल जलवायु परिवर्तन के परिणामों से निपटने में उनकी क्षमता अत्यंत सीमित है, इन बदलावों से निपटने के लिए उनके पास उन्नत तकनीकी साधन भी नहीं हैं। इसके अलावा, इन सबका प्रभाव केवल ग्रामीण कृषि संकट तक ही सीमित नहीं होगा बल्कि देश की खाद्य सुरक्षा, खाद्य वस्तुओं की कीमतें और साथ ही मानव स्वास्थ्य भी नकारात्मक रूप से प्रभावित होंगे। और इन सबके परिणाम स्वरुप लोगों के आंतरिक प्रवासन (माइग्रेशन) बढ़ने की आशंका से भी इंकार नहीं किया जा सकता। एक बार फिर, सबसे ज़्यादा प्रभावित होंगे हमारे समाज के सामाजिक एवं आर्थिक रूप से पिछड़े वर्ग, बच्चे और बुज़ुर्ग।

जलवायु परिवर्तन तो निश्चित है किन्तु इसके परिणामों की गंभीरता समाज के अलग अलग हिस्सों पर भिन्न भिन्न तरीकों से असर डालेगी। अतः यह स्पष्ट है की कमज़ोर वर्गों को जलवायु परिवर्तन के परिणामों से निबटने के लिए सक्षम बनाने हेतु ठोस प्रयासों की आवश्यकता है। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, 'देशों और समुदायों को जलवायु परिवर्तन - जनित ना केवल वर्तमान में हो रहे बदलाव अपितु दूरगामी प्रभावों से निबटने के लिए समुचित समाधान विकसित करने की ज़रूरत है।'

ऐसा नहीं है कि भारत में जलवायु परिवर्तन से लड़ने के प्रयास नहीं किए जा रहे हैं। लेकिन जहाँ जलवायु परिवर्तन कम करने (मिटिगेशन) के प्रयासों के विषय में स्पष्टता और निर्धारित लक्ष्य हैं (Nationally Determined Contributions); इसके प्रभावों से निपटने के लिए आवश्यक बदलावों (अडॉप्टेशन) की दिशाओं का आभास नहीं मिलता है। अतः जलवायु परिवर्तन अडॉप्टेशन के लिए परिभाषित एवं समयबद्ध लक्ष्य निर्धारित करना इस समय की सबसे बड़ी ज़रूरत है। और इसके लिए कुछ ऐसे संकेतक और समयसारणी होनी चाहिए जिनकी नियमित रूप से निगरानी की जा सके।

इस महत्वपूर्ण क्षेत्र में सफलता अंततः इस बात पर निर्भर करेगी कि हम पिछड़ी और गरीब आबादी की जरूरतों को कितनी अच्छी तरह से समझते हैं, खासकर जो कृषि पृष्ठभूमि से हैं; हमारी कृषि विस्तार सेवाएं कितनी अच्छी हैं; मौसम की आकस्मिक घटनाओं, कृषि और स्वास्थ्य क्षेत्रों में पूर्वामान में आधुनिक प्रौद्योगिकी का उपयोग करने में हम कितने निपुण हैं; और क्या हम तेजी से और किफायती तरीके से सफल प्रयोगों को आगे बढ़ाने में सक्षम हैं?

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