नए प्लास्टिक नियमों के ठोस निष्पादन से हो सकता है कचरा प्रबंधन में सुधार

10 Nov 2021
Mr Nikhil Prakash

सरकार की इतनी बड़ी मात्रा में जमा हो रहे कचरे से निपटने की प्रतिबद्धता का पता प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन नियम 2016 से चलता है जिसमें सरकार ने अगस्त 2021 में तीसरी बार संशोधन किया है। अगस्त 2021 में भारत सरकार द्वारा किए गए संशोधन से यह पता लगता है कि भारत इस मुद्दे का समाधान खोजने के लिए नए-नए प्रयास कर रहा है। हालांकि इस मामले में राजनीतिक सहमति के साथ-साथ नीतिगत हस्तक्षेपों के नतीजे सकारात्मक रहे हैं, लेकिन नीतियों का जमीनी स्तर पर निष्पादन अब भी एक बड़ी चुनौती बना हुआ है।

Plastic rules

आज प्लास्टिक कचरे ने दुनिया के कई देशों की कचरा प्रबंधन प्रणालियों (waste management systems) के सामने चुनौती पेश की है, इसीलिए अधिकतर देश इस समस्या से निपटने के लिए सक्रियता से कदम उठा रहे हैं। पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEF & CC) के नवीनतम आंकड़ों के अनुसार भारत सालाना लगभग 3.4 मिलियन टन प्लास्टिक कचरा उत्पन्न करता है, जिसमें करीब 60 प्रतिशत रिसाइकल होता है वहीं 40 प्रतिशत एकत्र ही नहीं किया जाता। इस मुद्दे की मौजूदा वक़्त में भयावहता और सरकार की इतनी बड़ी मात्रा में जमा हो रहे कचरे से निपटने की प्रतिबद्धता का पता प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन नियम 2016 से चलता है जिसमें सरकार ने अगस्त 2021 में तीसरी बार संशोधन किया है। अगस्त 2021 में भारत सरकार द्वारा किए गए संशोधन से यह पता लगता है कि भारत इस मुद्दे का समाधान खोजने के लिए नए-नए प्रयास कर रहा है। इस संशोधन में सिंगल यूज प्लास्टिक को परिभाषित करने के साथ-साथ सिंगल यूज प्लास्टिक कचरे को बाहर करने की समयबद्ध और चरणबद्ध योजना को भी परिभाषित किया गया है। हालांकि इस मामले में राजनीतिक सहमति के साथ-साथ नीतिगत हस्तक्षेपों के नतीजे सकारात्मक रहे हैं, लेकिन नीतियों का जमीनी स्तर पर निष्पादन अब भी एक बड़ी चुनौती बना हुआ है।

कचरे का सौ फीसदी कलेक्शन और उसको अलग-अलग रखना अब भी एक समस्या

यूनाइटेड नेशंस इन्वायरमेंटल प्रोग्राम (यूएनईपी) द्वारा काउंटर मेजर (CounterMEASURE initiative) पहल के तहत आगरा, हरिद्वार, मुम्बई और प्रयागराज में कराए गए एक अध्ययन से पता चलता है कि इन चार में से तीन शहरों में कचरे के डोर टू डोर कलेक्शन और उसको अलग-अलग रख पाने का स्तर सराहनीय नहीं है। इस अध्ययन में यह भी पाया गया कि नदियों के किनारे पर बसे मुंबई और हरिद्वार जैसे शहरों के स्लम क्षेत्रों में कचरे को इकट्ठा नहीं किया जाता जिससे कि ये क्षेत्र प्लास्टिक कचरा छोड़ने वाले हॉटस्पॉट केंद्रों में तब्दील हो गए हैं। साल 2008 में आवास और शहरी मामलों के मंत्रालय ने सर्विस लेवल बेंचमार्क को स्थापित करते हुए प्लास्टिक कचरे को इकट्ठा और अलग-अलग करने की पहचान दो प्रमुख कारकों के रूप में की थी, लेकिन शहरों के स्तर पर इनका निष्पादन होना अभी बाकी है।

कैरी बैग्स की मोटाई और उन पर पाबंदी

साल 2016 में लाए गए नियमों के तहत ये अनिवार्य किया गया था कि कैरी बैग्स की मोटाई कम से कम 50 माइक्रोंस होनी चाहिए। साल 2021 में हुए संशोधनों में यह कहा गया था कि इन बैग्स की मोटाई सितम्बर 2021 तक बढ़ाकर 75 माइक्रोन और दिसंबर 2022 तक बढ़ाकर 120 माइक्रोन कर दी जाएगी। हालांकि मोटाई के तय मानकों की अवहेलना करते हुए अवैध कैरी बैग्स की बिक्री और उपलब्धता अब भी जारी है और इसे शहरों के स्थानीय सब्जी और फल बाज़ारों में देखा जा सकता है। अध्ययन में यह भी पाया गया कि सभी चार शहरों में जिन दो सामानों से सबसे ज्यादा कूड़ा-करकट फैला था, उनमें प्लास्टिक कैरी बैग्स सबसे प्रमुख थे। यह स्थिति तब थी जब साल 2018 से उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में प्लास्टिक और थर्माकोल सामानों के इस्तेमाल, विनिर्माण, बिक्री और उनके फेंकने पर राज्य स्तरीय पाबंदी लगी हुयी है।

सिंगल यूज प्लास्टिक की परिभाषा और फेज आउट

नए संशोधन में सिंगल यूज प्लास्टिक को परिभाषित किया गया है और इस तरह शहरों को इस दिशा में आगे काम करने के लिए एक बुनियादी दिशा भी प्रदान की गई है। इससे ना सिर्फ़ नीतियों का निष्पादन करने वाली एजेंसियों के लिए काम करना आसान हो जाता है बल्कि उद्योगों को भी जरूरी स्पष्टता मिल जाती है। हालांकि साझेदारों यानी स्टेकहोल्डर्स के बीच जागरूकता पैदा करने और समय पर नीतियों को लागू करने का जिम्मा अब भी स्थानीय शहरी प्रशासन का ही होगा। नियमों में सिंगल यूज प्लास्टिक के तहत पहचान की गई कुछ श्रेणियों के लिए विशिष्ट तिथियों के साथ फेज़ आउट प्लान भी दिया गया है। पुराने स्थानीयकृत राज्य स्तरीय पाबंदी के प्रावधान के उलट ये नियम एकरूप राज्य स्तरीय दृष्टिकोण के साथ आगे बढ़ने का एक समग्र रास्ता मुहैया कराते हैं जिसके माध्यम से एक साझा राष्ट्रीय लक्ष्य पर काम किया जा सकता है।

आगे बढ़ने का आगे का रास्ता

नीति-निर्माताओं की ओर से अधिकतम विनियामक कवरेज सुनिश्चित करने के लिए किए जा रहे लगातार प्रयासों से शहरों को इन विनियमनों को लागू करने के नए अवसर मिल रहे हैं। शहरों की प्राथमिकता इन नियमों में निर्धारित किए गए सर्विस लेवल बेंचमार्क को हासिल करने की होनी चाहिए। इससे ना सिर्फ़ नागरिकों को बेहतर सेवा आपूर्ति हो सकेगी बल्कि शहर के स्तर पर स्वच्छता की स्थिति सुधारने के लिए मजबूत आधार भी मिल सकेगा। नीतियों पर नज़र रखना और उनका सत्यापन करना इस लिहाज से बहुत महत्वपूर्ण हो जाता है और स्थानीय शहरी प्रशासनों को हर हाल में मॉनिटरिंग समितियां गठित करनी चाहिए। इन समितियों में अधिकारियों को ये जिम्मेदारी दी जानी चाहिए कि वे शहरों में नियमों का लागू होना सुनिश्चित कर सकें। ये अधिकारी प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के सहयोगी के रूप में काम करते हुए निश्चित समयावधि पर आवश्यक सुझाव और कार्य की प्रगति से अवगत करा सकते हैं।

Footnotes:

[1] Rajya Sabha Question - https://pqars.nic.in/annex/254/Au677.pdf
[2] Counter Measures Project - https://www.npcindia.gov.in/NPC/Uploads/file%20upload/Annexure-%20I.pdf
[3] Service Level Benchmarks - http://cpheeo.gov.in/upload/uploadfiles/files/Handbook.pdf
[4] Swachh Bharat Mission - Urban 2.0 Making Cities Garbage free - Operational Guidelines- October 2021
[5] Amendment - https://static.pib.gov.in/WriteReadData/specificdocs/documents/2021/aug/doc202181311.pdf

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